मंगलवार, 18 मई 2010

देह भाषा भी मूलतः भाषा ही है l




हम जब कभी भाषा की बात करते हैं तो क्या कभी देह भाषा के बारे में भी सोंचते हैं ? अगर हम linguistic में देखे तो वहाँ भाषा को विभिन्न मुखाव्यवों द्वारा उच्चरित भाषा ही कहा जाता है और अगर आप लोगों से पूछे तो वे कहेंगे कि भाई साहब भाषा तो वही है जो मुँह से बोली जाती है और बहुत से बड़े विद्वानों ने भी भाषा के बारे में जो खोज किए हैं वो भी भाषा कि सरंचना के आधार पर ही किए हैं या फिर उसे समाज के साथ जोड़ कर ही देखा है (सस्यूर , ब्लूम फ़ील्ड , चोमस्की ,फ़र्ग्युसन ,लेबाव ,रविन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,भोलानाथ तिवारी ) पर उन्होंने कही भी भाषा को देह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जबकि अगर ध्यान से देखा जाए तो हमारी भाषा की शुरुआत ही संकेतों और देह भाषा ही से हुई है पहले समय में जब हमारे पास भाषा नही थी तब हम संकेतो, इशारों,शरीर के विभिन्न अंगों , चिन्हों के माध्यम से ही अपनी बात दूसरों तक पहुचाते थे पर धीरे- धीरे, जैसे- जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे- वैसे हम सिर्फ़ मुँह से बोलने वाली भाषा तक ही सीमित रह गए और यहाँ तक की सारी research वगैरह भी बाद में इसी पर सीमित हो गयी और हम ने अपनी भाषा का विकास जहाँ से शुरू किया था हम उसे भूल ही गए पर अगर हम गौर करे तो हम कम से कम अपनी आधी बातें तो संकेतों ,इशारो ,चिन्हों आदि से ही कहते हैं जैसे मुझे नही पता के लिए कंधे उचकाना, उंगली मुँह पर रखने का अर्थ है चुप रहना ,हाथ को घूमा के पूछने का अर्थ है क्या हुआ , ताली बजाने का अर्थ है किसी काम का अच्छा करने पर उसकी तारीफ़ करना ,किसी का हाथ छूना अब देखिये हाथ को छूने के भी , अर्थ निकलते है जैसे किसी माँ का अपने बेटे को छूने में ममता झलकती है ,किसी प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी को छूने से प्यार का पता चलता है इसी तरह किसी लड़के का किसी लड़की को आँख मारने या सीटी बजाने का अर्थ है की वह किसी लड़की को छेड़ रहा है और अगर दोस्त आपस में बात करते हुए एक -दूसरे को आँख मार रहे हो तो इसका अर्थ है की वे किसी तीसरे से किसी दूसरी बात को मजाक में ले रहे हैं ,माँ द्वारा अपने बच्चे को दूर से थप्पड़ दिखाने का अर्थ है की वो माँ उसकी पिटाई करेगी और किसी बात पर गुस्सा है ,एक उंगली को अपने कान के ऊपर थोड़ा सा लाकर फ़िर उंगली को घुमाने का अर्थ है की दूसरा व्यक्ति जो है वो पागल है , रुपये पैसे के लिए अंगूठे और पहली उंगली को , बार घूमाने का अर्थ है की व्यक्ति पैसों के बारे में बात कर रहा है इसी तरह भूख लगने पर हम अपने हाथ की पाँचो उंगलियों को मिलाकर उसे मुँह के पास ले जाते है, कहीं से बदबू आने पर रुमाल को मुँह पर रखते है आदि आदि और न जाने इस तरह के ही कितने संकेतो का इस्तेमाल हम अपने रोज़मर्रा के भावों और विचारों को बताने के लिए करते हैं पर हम फ़िर भी इस देह भाषा के बारे में कभी भी नही सोचते जबकि हमें अपनी भाषा में ही इसे भी जगह देनी चाहिए माना की ये भाषा का सीमित रूप है पर फ़िर भी जब हम समाज और भाषा के सम्बन्ध को देखते हुए भाषा की बात करते है तो जहाँ तक मुझे लगता है हम इस देह भाषा को अनदेखा नही कर सकते l

देह भाषा भी मूलत: भाषा ही हैl




हम जब कभी भाषा की बात करते हैं तो क्या कभी देह भाषा के बारे में भी सोंचते हैं ? अगर हम linguistic में देखे तो वहाँ भाषा को विभिन्न मुखाव्यवों द्वारा उच्चरित भाषा ही कहा जाता है और अगर आप लोगों से पूछे तो वे कहेंगे कि भाई साहब भाषा तो वही है जो मुँह से बोली जाती है और बहुत से बड़े विद्वानों ने भी भाषा के बारे में जो खोज किए हैं वो भी भाषा कि सरंचना के आधार पर ही किए हैं या फिर उसे समाज के साथ जोड़ कर ही देखा है (सस्यूर , ब्लूम फ़ील्ड , चोमस्की ,फ़र्ग्युसन ,लेबाव ,रविन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,भोलानाथ तिवारी ) पर उन्होंने कही भी भाषा को देह के साथ जोड़ कर नहीं देखा जबकि अगर ध्यान से देखा जाए तो हमारी भाषा की शुरुआत ही संकेतों और देह भाषा ही से हुई है पहले समय में जब हमारे पास भाषा नही थी तब हम संकेतो, इशारों,शरीर के विभिन्न अंगों , चिन्हों के माध्यम से ही अपनी बात दूसरों तक पहुचाते थे पर धीरे- धीरे, जैसे- जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे- वैसे हम सिर्फ़ मुँह से बोलने वाली भाषा तक ही सीमित रह गए और यहाँ तक की सारी research वगैरह भी बाद में इसी पर सीमित हो गयी और हम ने अपनी भाषा का विकास जहाँ से शुरू किया था हम उसे भूल ही गए पर अगर हम गौर करे तो हम कम से कम अपनी आधी बातें तो संकेतों ,इशारो ,चिन्हों आदि से ही कहते हैं जैसे मुझे नही पता के लिए कंधे उचकाना, उंगली मुँह पर रखने का अर्थ है चुप रहना ,हाथ को घूमा के पूछने का अर्थ है क्या हुआ , ताली बजाने का अर्थ है किसी काम का अच्छा करने पर उसकी तारीफ़ करना ,किसी का हाथ छूना अब देखिये हाथ को छूने के भी , अर्थ निकलते है जैसे किसी माँ का अपने बेटे को छूने में ममता झलकती है ,किसी प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी को छूने से प्यार का पता चलता है इसी तरह किसी लड़के का किसी लड़की को आँख मारने या सीटी बजाने का अर्थ है की वह किसी लड़की को छेड़ रहा है और अगर दोस्त आपस में बात करते हुए एक -दूसरे को आँख मार रहे हो तो इसका अर्थ है की वे किसी तीसरे से किसी दूसरी बात को मजाक में ले रहे हैं ,माँ द्वारा अपने बच्चे को दूर से थप्पड़ दिखाने का अर्थ है की वो माँ उसकी पिटाई करेगी और किसी बात पर गुस्सा है ,एक उंगली को अपने कान के ऊपर थोड़ा सा लाकर फ़िर उंगली को घुमाने का अर्थ है की दूसरा व्यक्ति जो है वो पागल है , रुपये पैसे के लिए अंगूठे और पहली उंगली को , बार घूमाने का अर्थ है की व्यक्ति पैसों के बारे में बात कर रहा है इसी तरह भूख लगने पर हम अपने हाथ की पाँचो उंगलियों को मिलाकर उसे मुँह के पास ले जाते है, कहीं से बदबू आने पर रुमाल को मुँह पर रखते है आदि आदि और न जाने इस तरह के ही कितने संकेतो का इस्तेमाल हम अपने रोज़मर्रा के भावों और विचारों को बताने के लिए करते हैं पर हम फ़िर भी इस देह भाषा के बारे में कभी भी नही सोचते जबकि हमें अपनी भाषा में ही इसे भी जगह देनी चाहिए माना की ये भाषा का सीमित रूप है पर फ़िर भी जब हम समाज और भाषा के सम्बन्ध को देखते हुए भाषा की बात करते है तो जहाँ तक मुझे लगता है हम इस देह भाषा को अनदेखा नही कर सकते l

शनिवार, 8 मई 2010

प्रति 54 मिनट


कल अपने पीएच.डी. से जुड़े शोध कार्य के सिलसिले के लिए एक स्कूल जाना पड़ा। मैंने कुछ students और teachers से बात की और अब दूसरे teacher का इंटरव्यू ही लेने जा रही थी की मुझसे कहा गया कि आप अपना काम कल कर लेना आज हमारी urgent meeting है । मुझे ऐसा सुनकर कुछ अजीब लगा क्योंकि कल ही तो मै स्कूल की प्रिंसिपल से बात करके गयी थी और उन्होंने भी कहा था की आप जब चाहे जितनी देर चाहे स्कूल में आ सकती हैं और अपना काम पूरा कर सकती हैं और इसमें हम आपका पूरा सहयोग देंगे। फिर अचानक से मुझे कल आने को क्यों कहा गया ? मै class से बाहर आई तो मुझे कुछ गड़बड़ लगी । मैंने एक teacher से पूछा की क्या हुआ आपकी कौन सी meeting है तब उन्होंने कहा की पता नहीं कल तक तो किसी meeting के बारे में नहीं बताया गया था । सारी teachers अपनी -अपनी class से बाहर निकल कर office में जाने लगी तब मैंने जिस class के बाहर भीड़ लगी थी उस class की एक लड़की से पूछा कि क्या हुआ स्कूल में क्या बात हो गयी तब उसने बताया कि हमारी class की एक लड़की का रेप हो गया है मै सुनकर पहले तो सकपका गयी फिर पूछा की कैसे ? तो उसने बताया कि उसके (लड़की के ) पड़ोस में रहने वाला एक आदमी स्कूल आया था उसने कहा की चल मै भी घर जा रहा हूँ तुझे छोड़ दूंगा वो उसे भाई कहती थी इसलिए वो उसके साथ चली गयी । पर उसने कही रास्ते में ले जाकर उसका रेप कर दिया । उसकी ये बात सुनकर मुझे अखबारों में आने वाली बलात्कार की घटनाएं याद आने लगी। आज रिश्तों की अहमियत ही नहीं रह गयी है सोतेला बाप बेटी से बलात्कार करता है चचेरा ,ममेरा ,मौसेरा भाई अपनी ही बहनों के साथ बलात्कार करते हैं यहाँ तक कि पुलिस वाले तक ....... आखिर विश्वास किया जाए तो किस पर ?

हाल ही में मैंने एक उपन्नयास " 54 मिनट " (महाशेवता देवी ) पढ़ा जिसमे यही समस्या थी । उसमे वकील उषा पटेल बताती हैं कि " इस देश में प्रति 54 मिनट में एक स्त्री का बलात्कार होता है , दो घन्टे में दहेज़ के लिए एक वधु की ह्त्या होती है , प्रति 54 मिनट में एक स्त्री का अपहरण होता है , प्रति 26 मिनट में पुरुषों द्वारा तैयार की गयी न्याय व्यवस्था के रहते हुए किस स्त्री को न्याय मिलेगा ? ''

बलात्कार एक ऐसी सज़ा है जो लड़की को बिना किसी जुर्म के पूरी ज़िन्दगी भुगतनी पड़ती है । उसका जीवन नरक हो जाता है ।यहाँ तक की कभी कभी तो वह आत्महत्या भी कर लेती है । वह सहज नहीं हो पाती। ( और होना भी चाहे तो समाज उसे होने नहीं देता) लोग उसके चरित्र पर उंगलियाँ उठाते हैं, ताने कसते है, यहाँ तक की उसके सबसे करीब उसके अपने उसका साथ तक नहीं देते । इससे सिर्फ लड़की का जीवन ही बर्बाद नहीं होता बल्कि उसका घर भी बर्बाद हो जाता है। प्रति 54 मिनट की नायिका (जिसका बलात्कार होता है) का पिता कहता है "यह मर्डर नहीं तो और क्या है ?मेरा जीवन , इज्ज़त सबका खून हो गया । मेरी बीवी ....मेरी बीवी यह हत्या तो है ही । मेरी बेटी कभी स्वाभाविक जीवन जी सकेगी ? इतने जीवन नष्ट हो गए । यह हत्या नहीं तो और क्या है ?''

मुझे
लगता है कि हमें अपनी हिफाज़त के लिए सिर्फ पुलिस या क़ानून तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि हमें खुद भी इसके लिए कुछ करना चाहिए जैसे आजकल तो फ्री कैंप भी लगाए जाते हैं जिसमे लड़कियों को अपनी हिफाज़त करने के तरीके सिखाए जाते है हमें उमे जाना चाहिए । दूसरी बात ये है कि हमारे माता -पिता को भी अपनी सोंच बदलनी चाहिए और हमें इन कैम्पों में जाने का मौका देना चाहिए और हमारा पूरा सहयोग करना चाहिए। तीसरी बात ये है कि न्यायालयों को भी इसमें पाए जाने वाले दोषी को कड़ी सजा देनी चाहिए जिससे की लोगों में इस तरह की हरकत करने से पहले परिणाम का डर हो ।

बुधवार, 31 मार्च 2010

प्यार पर रोक क्यों ?


आज के जनसत्ता में खबर पढ़ी कि एक ही गोत्र में शादी करने के कारण करनाल में मनोज और बबली नाम के एक जोड़े को मौत के घाट उतार दिया गया था । करनाल की जिला और सत्र न्यायालय ने इस मामले में पाँच लोगों को सजा- ए- मौत और एक को उम्र कैद की सजा सुनाई। करनाल की जिला और सत्र न्यायालय द्वारा किया गया ये कार्य प्रशंसनीय है । मनोज और बबली को ये सजा सिर्फ इसलिए दी गयी कि उन्होंने प्यार में आकर सामाजिक मान्यताओं को दरकिनार कर शादी कर ली थी। इस खबर को पढ़ कर मुझे दिबाकर की फिल्म "लव , सेक्स , और धोंखा" की याद आ गयी । इस फिल्म के पहले भाग( प्रारम्भ की स्टोरी ) में भी इसी तरह का मुद्दा उठाया गया है । अपनी मर्जी से शादी करने पर लड़की का भाई और पिता उन दोनों (प्रेमी ओर प्रेमिका )को मरवा देता है । इन सभी बातों को पढ़ कर या देख कर समाज के उन ठेकेदारों (जो प्रेम विवाह का विरोध करते है ) के प्रति जो इस तरह की हरकत करते हैं नफरत और गुस्से से मन भर जाता है है तो दूसरी तरफ इन प्रेमियों के प्रति सहानुभूति भी होती है कि इन लोगों ने किसी का क्या बिगाड़ा होता है सिर्फ इतना ही तो की ये एक - दूसरे को पसंद करते हैं और बिना किसी शर्त के पूरा जीवन एक- दूसरे के साथ बिताना चाहते हैं पर इनके माँ -बाप अपनी झूठी शान की खातिर अपने उन बच्चों की दुर्गति करने में भी पीछे नहीं हटते जिन्हें वे सालों- साल तक पाल कर उनका भरण -पोषण करते है । बच्चों को मौत के घाट उतारते वक्त उन्हें जरा भी मलाल नहीं होता क्या ये माँ बाप है ?जो जल्लाद को भी पीछे छोड़ देते है मनोज और बबली का केस तो न्यायालय तक पहुचने के कारण हमारे सामने आ भी गया वरना जाने ऐसे कितने और केस होंगे जिनका हमें पता भी नहीं चल पाता है । पर इस बात की ख़ुशी है की इस तरह के केस सामने आने की शुरुआत तो हो ही गयी है और हम सभी को भी इसका साथ देना चाहिए जिससे किसी और बबली या मनोज की जान ना जाए किसी से प्यार करने या शादी करने का अर्थ कुछ गलत काम करना नहीं है । तो जब वे कुछ गलत कर ही नहीं रहे तो फिर सजा किसे और किस बात की ? मै जब भी कभी इसी तरह के किन्ही जोड़ों या फिर दोस्तों को देखती हूँ तो उनके खिले हुए चेहरों को देख कर मन को काफी सुकून मिलता है पता नहीं क्यों लोग इनकी खुशियों को छीनना चाहते है, छीनने की कोशश करते हैं पता नहीं हम लोगों की ये कट्टर मानसिकता कब ख़तम होगी और हम जाति , बिरादरी , आदि से बाहर निकल कर एक - दूसरे को इंसान समझेंगे और सहज जीवन जीने देंगे ।

रविवार, 14 मार्च 2010

भाषा एकांगी नहीं होती l

हम भाषा के बदलते रूप की बात करते हैं और प्राय: भाषा को हिंग्लिश (हिंदी तथा इंग्लिश )तक ही सीमित रख देते हैं। जब भी कभी हिंदी भाषा की बात की जाती है तो पहला सवाल अक्सर ये ही देखा जाता है कि हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी भाषा के वर्चस्व से कैसे बचाया जाए। हम अक्सर हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी भाषा के सापेक्ष रखकर ही देखते हैं । इस मुद्दे को लेकर कुछ सेमिनार भी होते रहे हैं जैसे विश्वपुस्तक मेले में "हिंदी क्या है" और दिल्ली विश्वविद्यालय में भी इस विषय को लेकर सेमिनार हुए थे जिसमे बात आगे बढ़ते- बढ़ते अंग्रेज़ी और हिंदी तक ही सीमित रह गयी थी। मै जब भी इस तरह के सेमिनारों को सुनती हूँ तो मेरे जेहन में हमेशा एक बात आती है कि भाषा अब केवल हिंग्लिश तक ही सीमित नहीं रह गयी है बल्कि उससे भी आगे बढ़ कर वह मिक्सिंग की भाषा बन गयी है आज की भाषा विभिन्न कोडों (भाषा / बोली /शैली ) से उत्पन्न " कोड मिक्सिंग" की भाषा है। विभिन्न कोडों से उत्पन्न भाषा का यह रूप न तो पिजिन ही है और न ही क्रियोल । वास्तव में यह आज की जरुरत के हिसाब से भाषा की एक अलग बनावट है ।
जब हम भाषा की बात करते हैं तो उसमे कोई एक खास वर्ग नहीं होता बल्कि हर जाति, धर्म, लिंग, वर्ग , आयु आदि की भाषा उसमे सम्मिलित होती है। कोई अनपढ़ व्यक्ति हो या पढ़ा लिखा व्यक्ति, बुद्धिजीवी हो या आम जनता या फिर अख़बार पत्र -पत्रिकाएँ आदि कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ हमें भाषा की मिक्सिंग देखने को न मिलती हो । व्यक्ति जिस क्षेत्र से संबंधित होता है उस क्षेत्र की भाषा के आलावा भी वह अपनी जरूरतों के हिसाब से अन्य भाषाओँ /बोलियों को सीखता तथा समझता है और अपने भाषाई कोश का विकास करता है । इस भूमंडलीकरण के दौर में व्यक्ति कूप मंडूक होकर नहीं रह सकता। उसे अपने ज्ञान के विस्तार के लिए दूसरी भाषाओँ / बोलियों की ओर जाना ही पड़ता है । आज के दौर में केवल एक भाषा तक ही सीमित रहने का अर्थ है अपनी अभिव्यक्ति को सीमित करना , विकास के दौर में पिछड़ना। आज जब एक भाषा के साहित्य का दूसरी भाषा में अनुवाद हो रहा है ; कंप्यूटर , इन्टरनेट की भाषा हमारी भाषा पर प्रभाव डाल रही है तब भाषा के बदलते रूप को कैसे और क्यों रोका जाना चाहिए ? कोई भी वस्तु सदा एक सी नहीं रहती समय के साथ- साथ प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन आता ही है अत: भाषा में भी परिवर्तन आना लाज़मी है । हमारा पहला उद्देश्य भाषा का पांडित्य प्रदर्शन न करके आत्माभिव्यक्ति और सम्प्रेषण के साथ -साथ भाषा को तकनीक से जोड़ना होना चाहिए ।
हिंदी भाषा पर जब कभी, कहीं कुछ होता है तब हमेशा दो - तीन बातें बोली जाती हैं कि हमें हिंदी को अंग्रेज़ी के वर्चस्व से बचाना है , उसे राष्ट्रभाषा बनाना है आदि -आदि । जबकि हमें इन सभी बातों से आगे बढ़ कर यह सोंचना चाहिए कि दूसरी भाषा के समक्ष हम अपनी भाषा को उपयोगी भाषा कैसे बनाएं ? जो तकनीक से जुडी रोज़गार परक भाषा हो जिससे युवा वर्ग खुद ही इसकी ओर आकर्षित हो । हमें अपनी भाषा को सभी क्षेत्रों से जोड़ना होगा और इसके लिए हमें भाषा को सीमित दायरे से बाहर निकाल कर दूसरी भाषाओँ /बोलियों से निरंतर आ रहे शब्दों को अपनाते चलना होगा । कहा भी जाता है कि भाषा बहता नीर है अत: भाषा कभी भी बंधकर नहीं रह सकती वह समय के साथ -साथ अपनी जरूरतों को पूरा करती हुई आगे बढ़ती जाती है । इसीलिए हमारी भाषा आज - "मिक्सिंग- भाषा " बन गयी है और इस मिक्सिंग -भाषा ने व्यक्ति को समाज से जोड़ने में बड़ा ही महत्वपूर्ण काम किया है । भाषा एकांगी नहीं होती और न ही वह एकांगी दृष्टिकोण आधारित होकर अपना विकास कर सकती है । भाषा का विकास अन्य भाषाओँ के शब्दों एवं नए इजाद किये जा रहे शब्दों को सहर्ष स्वीकार करने में है । हमें भाषा की कोड - मिक्सिंग से हो रहे भाषा के विकास को सकारात्मक नज़रिए से देखने की जरुरत है न की किसी भाषा को वर्चस्व की भाषा बनाकर उसे थोपने की । किसी भाषा के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण इसी थोपने की प्रवृति में छिपा है । जो संस्कृत के साथ हुआ या हो रहा है हमें हिंदी को उससे बचाना होगा और साथ ही हमें हिंदी को उस वर्चस्ववादी भाषावाद के खतरनाक रूढ़ीवाद से भी बचाना होगा जो हिंदी में अन्य भाषिक शब्दों के आगमन को " हिंदी के पतन " के रूप में देखता हैl ध्यान रहे कि यदि हम ऐसा करते हैं तो एक तरह से हम हिंदी में राज ठाकरे के" मराठी मानुष " की जुगाली करते ही प्रतीत होंगेl

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली की हार्दिक शुभकामनाएं

आप सभी को "होली" की बहुत- बहुत शुभकामनाएँ


शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

होली के रंग "ब्रज कला केंद्र" के संग



कल पहली बार "ब्रज कला केंद्र" जाने का मौका मिला। वहाँ हर साल होली के उपलक्ष्य में कार्यक्रम किया जाता है। 1962 में 'ब्रज कला केंद्र ' की स्थापना हुई थी और तब से लेकर आज तक यहाँ ब्रज की कला और संस्कृति को आगे बढ़ाने का कार्य किया जाता है । इस बार भी "हो हो लाल होरी है " के नाम से वहाँ होली उत्सव मनाया गया । अन्दर घुसते ही देखा की शहनाई की मोहक धुन बज रही थीं। ये धुनें ब्रज के वे लोक गीत थे जो लोक धुनों के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत किये जा रहे थे। कार्यक्रम प्रारंभ हुआ सबसे पहले खान- पान किया गया। गुलाबजामुन ,टिक्की, दहीभल्ले, पूरी- सब्जी, गोलगप्पे, ठंडाई सभी में मथुरा का स्वाद था। इनमे से कुछ चीज़ें तो मथुरा से ही बनी- बनाई आई थीं जबकि कुछ चीज़े बनाने के लिए सामान मथुरा से मंगाया गया और वे वही पर ही तैयार की गयीं । खान- पान से निपटने के बाद कार्यक्रम को आगे बढाया गया। शुरुआत कृष्ण वंदना से हुई। तत्पश्चात एक गीत मथुरा से आई हुई कुछ लड़कियों द्वारा प्रस्तुत किया गया उसके बाद मथुरा से ही आई हुई team ने कृष्ण के 9 अवतारों की नाट्य प्रस्तुति की नाट्य प्रस्तुति में कृष्ण के एक -एक करके सभी अवतार गायन -दृश्य माध्यम से दिखाए गए और अंत में रास- लीला के सुन्दर दृश्य प्रस्तुत किये गए। रास लीला देखने लायक तथा मन को हरने वाली थी। रासलीला देख कर सभी का मन इतना तन्मय हुआ कि कुछ लोग तो स्टेज पर जाकर कृष्णमय ही हो गए ब्रज भाषा के प्रयोग ने कार्यक्रम की शोभा और अधिक बढा दी।