बुधवार, 6 जनवरी 2010




आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ
happy
new
year

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

जानवर

हाँ

मैंने माना कि मै जानवर हूँ

हाँ

मैंने माना कि मै जानवर हूँ

पर................

क्या?

तुम अपने को इंसान कह सकते हो ?

मैंने न मारा किसी को

न की गाली -गलोच

न किसी को रुलाया- सताया

पर

तब भी न जाने क्यों?

जानवर मै कहलाया

कहते है तुम हो बुद्धिमान

पर क्या बचा पाए तुम अपना इमान

नहीं तुम इंसान नहीं

तुम भी हो एक जानवर

जो दूसरो को नोचता हुआ

रिश्तों को तोड़ता हुआ

बस आगे बढ़ना चाहता है

चाहे उसके लिए उसे जानवर(खुन्कार ) ही क्यों न होना पड़े

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

ऐसा क्यों होता है ?

क्यों?
तुम्हारे चुप रहने से
दुखी होने से
मुझे दर्द होता है
क्यों ?
तुम्हारे किसी गैर के साथ रहने से
हंसी ठिठोले करने से
उसके बारे में मुझसे भी ज्यादा सोंचने से
उसके लिए कुछ करने से
मुझे दूरी का अहंसास होता है
क्यों ?
हमेशा मैंने चाह की तुम मेरे पास रहो
तुम मेरे ही साथ रहो
मेरे होकर रहो.......
ये दर्द
ये अहंसास
ये चाह
आखिर........
मुझे सिर्फ ''तुम'' ही से क्यों है ?

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

आम आदमी और महंगाई


बस में बैठी ही थी कि अचानक से वो मेरे पास आकर बैठ गया, मुझसे सुना कुछ नही ( उसकी बातों से ऐसा लगा भी की वो सुनना नही बल्कि सुनाना ही चाहता है ) बस ख़ुद ही बोलता गयाl पहले तो मै कुछ घबरा- सी गयी पर उसकी बात को ध्यान से सुना तो लगा की वो अपनी बात किसी को सुनाना चाहता हो वो बिना मेरी ओर देखे बस टिकट , आटा , खर्चा , आदि कि बातों में ख़ुद ही उलझा रहाl जब मैंने एक बार उसकी तरफ़ देखा तो उसने भी अपनी बात और ज्यादा विश्व्वास के साथ कहनी शुरू कर दी उसके कपड़े और बोलने के ढंग को देखने से लगा की वो कोई छोटा सा काम करने वाला आदमी है जिसकी monthly incom बहुत ही कम है मेरे stand ( art feculty ) तक वो मुझसे सिर्फ़ अपनी हालत और हालात के बारे में ही कहता गयाl मुझे उसकी बातों को सुनना अच्छा लग रहा था (क्योकि दूसरे के बारे में हम कम ही सोच पाते हैं और बोल पाते हैं )इसलिए मै उसकी बात बस सुनती ही चली जा रही थी और उसके देखने पर बस गर्दन ही हिला रही थी इतने में मुझे सरकार की पानी महंगा करने की बात याद आई और मन में जाने कितने ही सवाल उठने लगे की इस महंगाई को क्या सब लोग झेलने की हिम्मत रखते है? सरकार को अगर चीज़ों के दाम ज्यादा ही करने थे तो सभी के दाम एक साथ महंगे करने जरुरी थी ? या चीज़ों के दाम धीरे- धीरे कर के भी बढाए जा सकते थे lइस समाज / देश में सारे लोगों की आर्थिक स्थिति क्या एक सी ही है ? जो लोग महीने के सिर्फ़ और सिर्फ़ 5000 रूपये कमाते है क्या वो ये बस का किराया ,ये महँगी साग- सब्जी ,ये पानी का बिल झेल पाएगा जबकि इसी पैसो में उसे घर का खर्च भी चलाना है ,अपने बच्चे को स्कूल भी भेजना है और समाज के सारे रीती -रिवाजों को भी निभाना है क्या इस तरह से आत्महत्याएँ , depression, tension आदि बिमारियाँ नही बढेंगी ? इन बातों के बारे में सोचना भी उतना ही जरुरी है जितना की महंगाई को बढ़ानाl सरकार को इस बारे में भी कुछ सोंचना चाहिए l

शनिवार, 21 नवंबर 2009

कोशिश


लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

शनिवार, 7 नवंबर 2009

आख़िर अपराधी कौन?


काफी दिनों से तबीयत ठीक सी नहीं चल रही थी, आस- पास के डॉ. से दवाई लेने के बावजूद भी आराम नही पड़ रहा थाl तब मै अपने घर से थोड़ी दूरी पर एक दूसरे डॉ. से दवाई लेने चली गयीl मेरा नंबर पाँचवा था तो मेरे पास उन मरीजों को देखने के अलावा और कोई काम भी नहीं था धीरे - धीरे तीसरा नंबर आया वो आदमी अपनी २५ -३० बरस की लड़की की दवाई लेने आया था देखने में दुबला- पतला सा था और कपड़े भी मैले से ही पहने हुए थे उसकी लड़की काफी कमज़ोर सी और उसे देख कर ऐसा लगता था की मानो शरीर का सारा खून खत्म ही हो गया हैl दवाई लेने के बाद वो आदमी अपनी बेटी को लेकर घर जाने लगा उसने लड़की को सीढियों से आराम से उतारा फ़िर अपने कंधे पर उसे बिठाकर ऐसे ही अपने घर ले जाने लगा क्योकि वो ख़ुद भी इतना कमज़ोर था कि ........और शायद इसीलिए भी कुछ लोंगो ने उसे देख कर कहा कि ''बाबा तुम ऐसे कैसे इसे ले जाओगे किसी रिक्शे वाले को बुला लो'' तब उसने कहा कि ''बुला तो लूँ पर मेरे पास उसे देने को पैसे नहीं हैं जो पैसे थे उससे इसकी दवाई ले चुका हूँ'' उसके ऐसा कहने पर किसी ने भी आगे कुछ नहीं कहा बस सब उस बूढे को देखते ही रहे और शायद कुछ सोंचते रहे ,उन सोंचने वालों में से एक मै भी थी, मै उसकी help करना चाहती थी पर कर ना सकी ,उससे कुछ पूछना चाहती थी पर पूछ भी न सकी और घर आकर अपने आपको अपराधी सा समझने लगी पर फ़िर लगा कि इस बात के लिए क्या सच में ही मै दोषी हूँ या आज की परिस्थितियाँ ही ऐसी बन गयी हैं कि आज चाहते हुए भी कोई किसी पर विश्वास ही नहीं कर पाता ,हम चाह कर भी किसी की help नहीं कर पाते किसी के लिए कुछ कर नहीं पाते आज जहाँ भी देखो ( बस में, सड़कों पर , शैक्षिक संस्थानों आदि आदि ) के आस- पास कोई न कोई ऐसा खड़ा हुआ मिल ही जाता है जो झूठ बोल- बोल कर लोगो के पैसे ऐंठना चाहता है और कभी -कभी तो ये लोग ग़लत हरकतों पर भी उतर आते हैं शायद ये ही ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से एक दूसरे पर लोगो का भरोसा कम होता जा रहा है

रविवार, 1 नवंबर 2009

अनुभव

दिन की दुपहरी में ,
बिलखता वह नवजात
शायद इंतज़ार में,
जो हटा यह उमस,
देगा छाँव

उसका यह रूदन
यह पीडा,
कोई नही पहचानता
और,

वह काया
जिसने पुण्य पाया था
जा चुकी थी
पर..............

अब भी है देखा करती
पंक सम छाया को
मैंने महसूस किया है
हाँ, मैंने अनुभव किया हैl